रामायण: कौन चलाता है सूर्यदेव का रथ, पक्षियों के राजा गरुड़ और उनके बीच क्या संबंध है

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उज्जैन: पुराणों के अनुसार, भगवान सूर्यदेव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो पंचदेवों में शामिल हैं और ग्रहों में भी। इन्हें ग्रहों का राजा भी कहा जाता है। सूर्यदेव के प्रभाव से ही जीवन में सुख-दुख का आना-जाना लगा रहता है।

ऐसा कहा जाता है कि सूर्यदेव अपने साथ घोड़ों के रथ पर सवार होकर निरंतर चलते रहते हैं। उनका रथ एक क्षण के लिए भी नहीं ठहरता। लेकिन इस रथ को चलाता कौन हैं, इस बारे में बहुत कम लोग जानते हैं? आज हम आपको सूर्यदेव का रथ चलाने वाले सारथी के बारे में बता रहे हैं.

अरुण हैं सूर्यदेव के रथ के सारथी ?

महाभारत के अनुसार, सूर्यदेव का रथ चलाने वाले सारथी का नाम अरुण हैं। ये भगवान विष्णु के वाहन गरुड़देव के भाई हैं। ये महर्षि कश्यप और विनिता की संतान हैं। कथाओं के अनुसार, विनिता ने अपने पति महर्षि कश्यप की सेवा कर दो महापराक्रमी पुत्रों का वरदान मांगा। महर्षि कश्यप ने उन्हें ये वरदान दे दिया। समय आने पर विनिता ने दो अंडे दिए। महर्षि कश्यप ने विनिता से कहा कि “इन अंडों से तुम्हें दो पराक्रमी पुत्रों की प्राप्ति होगी।”

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अरुण ने क्यों दिया अपनी माता विनिता को श्राप ?

काफी समय बाद भी जब उन अंडों से बच्चे नहीं निकले तो उत्सुकतावश विनिता ने एक अंडे को समय से पहले ही फोड़ दिया। उस अंडे से अरुण निकले, लेकिन समय से पहले अंडा फोड़ने के कारण उनके पैर नहीं थे। क्रोधित होकर उन्होंने अपनी माता को सौतन की दासी बनने का श्राप दिया। इसके बाद अरुण ने घोर तपस्या की और भगवान सूर्यदेव के रथ के सारथी बन गए।

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अरुण और विष्णुजी के वाहन गरुड़ में क्या संबंध है ?

महाभारत के अनुसार, विनिता के दूसरे अंडे से महापराक्रमी गरुड़ का जन्म हुआ। इस तरह अरुण और गरुड़ एक ही माता-पिता की संतान हैं यानी भाई हैं। अरुण के श्राप के कारण जब उनकी माता अपनी सौतान कद्रूी की दासी बनी तो गरुड़ ने उन्हें दासत्व से मुक्त करवाया। उनके पराक्रम को देखकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपना वाहन बनाया।

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अरुण की ही संतान थे संपाति और जटायु ?

रामायण में दो गिद्ध पक्षियों का भी वर्णन हैं, इनका नाम जटायु और संपाति है। ये दोनों अरुण की ही संतान बताए गए हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार, अरुण की पत्नी का नाम श्येनी है। अरुण और श्येनी के दो पुत्र हुए- संपाति और जटायु। जब रावण देवी सीता का हरण कर ले जा रहा था, उस समय जटायु ने उसे रोकने का प्रयास किया, युद्ध के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। वहीं संपाति ने ही वानरों को ये बताया था कि राक्षसराज रावण देवी सीता का हरण कर लंका नगरी में ले गया है।

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